शुरुआत में वह बहुत छोटा होता है। एक अक्षर एक ध्वनि बनता है। एक ध्वनि एक शब्द बनती है। एक शब्द एक दरवाज़ा बन जाता है। जल्दी ही बच्चा समझ जाता है कि पन्ने पर बने निशान समय, समुद्र और पीढ़ियों के पार आवाज़ें ले जा सकते हैं।
अचानक दुनिया उस कमरे से बड़ी हो जाती है जिसमें वह बैठा है।
पढ़ने से बच्चा जानता है कि जिज्ञासा की कोई दीवार नहीं होती। एक किताब उसे प्राचीन नगरों, दूर की आकाशगंगाओं और सदियों पहले जी चुके लोगों के मन तक ले जा सकती है। वह सीखता है कि ज्ञान सिर्फ ताक़तवर लोगों के लिए बंद नहीं है। वह हर उस व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहा है जो एक पन्ना खोलने को तैयार हो।
लिखने से बच्चा सीखता है कि उसके विचार मायने रखते हैं। उसके प्रश्न मायने रखते हैं। उसके सपने मायने रखते हैं। शब्द उसे विचार गढ़ने, कहानियाँ बाँटने, अन्याय को चुनौती देने, दूसरों को सांत्वना देने और बेहतर भविष्य की कल्पना करने की ताक़त देते हैं।
जो बच्चा पढ़ सकता है, वह अपने आप कुछ भी सीख सकता है। जो बच्चा लिख सकता है, वह दुनिया को बता सकता है कि वह कौन है।
और जब लाखों बच्चे यह स्वतंत्रता पा लेते हैं, तब उससे भी बड़ा कुछ होता है। समाज अधिक विचारशील बनते हैं। समुदाय अधिक दयालु बनते हैं। विचार डर से तेज़ चलते हैं। ज्ञान अज्ञान से आगे तक पहुँचता है।
हर बच्चा जो पढ़ना सीखता है, अपने साथ खोज की संभावना लेकर चलता है। हर बच्चा जो लिखना सीखता है, अपने साथ बदलाव की संभावना लेकर चलता है।
आज किसी पुस्तकालय में वह भविष्य का वैज्ञानिक बैठा हो सकता है जो रोगों का इलाज करेगा, वह कवि जो हमें कम अकेला महसूस कराएगा, वह मार्गदर्शक जो लोगों को शांति की ओर ले जाएगा, वह शिक्षक जो हज़ारों और मनों को जगाएगा।
लेकिन उन भविष्य में से कोई भी शक्ति या धन से शुरू नहीं होता। वे शुरू होते हैं एक बच्चे, एक पन्ने और उस क्षण से जब चिन्ह जीवित हो उठते हैं।